chandi devi

हरिद्वार में  हर की पैड़ी से यही कोई चार किलोमीटर दूर गंगा के पूर्वी किनारे पर स्थित है ‘चण्डीघाट’। इसी से लगे ‘नील पर्वत’ पर लगभग तीन किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ने पर आता है यह पावन चण्डी देवी मन्दिर। इसके ठीक सामने पश्चिम में गंगा नदी के उस पार ‘विल्वक’ पर्वत पर लोगों की मनौती पूरी करने वाली ‘मनसा देवी’ का मन्दिर है।
चण्डी देवी का यह पौराणिक मन्दिर देवभूमि उत्तराखण्ड की शीर्षस्थ सिद्धपीठों में एक है। देवी अराधक ‘शाक्त सम्प्रदाय’ में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती इन तीनों के ‘एकीकृत विग्रह’ यानि तीनों महादेवियों के एक संयुक्त अवतार को ही चण्डी अथवा दुर्गा कहा जाता है।
इस पावन पीठ की एक और विशेषता यह है कि रामभक्त हनुमान की माताश्री ‘अंजनि’ का जग प्रसिद्ध एकमात्र मन्दिर भी यहीं इसी मन्दिर के पास ही है। चण्डी देवी के इस मन्दिर में साल में दो बार चैत्र व दशहरे के नवरात्रों पर भव्य मेला लगता है।
चण्डीदेवी सिद्धपीठ के चलते ही महातीर्थ हरिद्वार का महात्म्य और बढ़ जाता है। इसीलिए शैव व वैष्णव साधना का यह गढ़ शाक्त साधना का भी गढ़ है। विद्वतजनों ने ठीक ही कहा है- विल्केश्वर, दक्षेश्वर, कोटिश्वर जैसे सिद्ध शिव मन्दिर के कारण यह महातीर्थ शैव क्षेत्र ‘हरद्वार’ कहलाता है तो हरिपद यानि हर की पैड़ी तीर्थ के कारण वैष्णव क्षेत्र हरिद्वार व चण्डी देवी समेत माया देवी, मनसा देवी, दक्षिण काली मन्दिर के चलते शाक्त यानि शक्ति की देवी का क्षेत्र- अहोगंग और मायापुरी।
इसी चण्डी देवी मन्दिर की वजह से ही सामान्य बोलचाल में समूची पहाड़ी चण्डी पर्वत कहलाती है। उत्तर मध्यकाल में यह पूरा क्षेत्र चण्डी परगना कहलाता था। नील पर्वत इसी का एक और ऐतिहासिक नाम है, जो प्राचीनकाल मंे मोरगिरी कहलाता था। कहते हैं, मोरों की बहुलता के कारण यह नाम पड़ा। दरअसल यह इलाका पूर्व में ‘बौद्ध-विहार’ रहा और बौद्ध अनुयायी मोर पाला करते थे। खुद सम्राट अशोक के राज्य का राष्ट्रीय चिन्ह मोर ही था।
इतिहासकारों का कहना है कि आठवीं सदी में बौद्ध धर्म के अवसान के बाद शंकराचार्य के समय मोरों के नीले रंग के चलते मोरगिरी नाम लुप्त होकर पुराण सम्मत नाम नील पर्वत हो गया। हालांकि कुछ लोग नील पर्वत को नागवंशीय ‘नील-नाग’ और नीलकंठ तीर्थ से भी जोड़ते हैं। कहते हैं नीलकंठ महादेव भक्तों की रक्षा के लिए इसी पर्वत पर रहे और साथ में आसीन हुई माँ चण्डी देवी।