पवित्र मंदिर का इतिहास

chandi devi

माँ चंडी देवी विश्व प्रसिद्द हिन्दू तीर्थ हरिद्धार में माँ गंगा अनादि काल से चली आ रही परम पवित्र अवरिल मोक्ष प्रदियानी नील धारा के पूर्वी किनारे पर स्थित परम रमणीक नील पर्वत पर स्थित है. माँ चंडी देवी मंदिर हरिद्धार के प्रमुख पांच तीर्थ में से  एक तीर्थ नील पर्वत तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है अनादि काल से माँ चंडी देवी मंदिर में आराधना भक्तो को अकाल मृत्यु  रोग नाश शत्रुभय आदि कष्टो से मुक्ति प्रदान करने वाली तथा प्रत्येक प्रकार की मनोकांशा पूर्ण कर अष्टसिद्धि प्रदान करने वाली है

माँ चण्डी देवी मन्दिर का इतिहास

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नीलपर्वत, स्थित चण्डी घाट, हरिद्वार में माँ चण्डी देवी ने चण्ड-मुण्ड, चिक्षुर, चामुर, आदि नामक असुरो का संहार किया था, देवी भागवत के पाँचवें स्कन्द के अनुसार माँ काली ने हिंसा का रूप सामने ना आ सके इस कारण स्वयंभु खम्बे के रूप में अवतरित होकर चण्ड व मुण्ड का संहार किया था। माँ चण्डी देवी मन्दिर के गर्भ गृह में एक गुप्त शिवलिंग तथा माँ चण्डी देवी की दौ प्रतिमाएं प्रारम्भ से ही स्थापित है, जिनमे से सामने की एक प्रतिमा माँ मंगल चण्डी की तथा किनारे की प्रतिमा माँ रूद्र चण्डी की है। माँ रूद्र चण्डी एक खम्बे के रूप में स्वयंभु अवतरित है। गुरू-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत मन्दिर के वर्तमान एकमात्र महन्त श्री रोहित गिरी जी को परम्परागत रूप से पिडी दर पिडी प्राप्त जानकारी के अनुसार, आठवीं शताब्दी में माँ चण्डी देवी मन्दिर का जीर्णोद्बार, जगत गुरू आदि शंकराचार्य जी द्वारा विधिवत रूप से की गयी थी। वर्ष 1872 में कश्मीर के राजा सुचेत सिंह ने मन्दिर का जीर्णोद्बार कराया था।

माँ चण्डी शब्द का अर्थ

यह कि हिन्दु पुराणों के अन्तर्गत श्रीमार्कण्डेय पुराण के सावर्णिक मन्वन्तर (77 वें अध्याय) में देवी माहात्मय का वर्णन किया गया है जो कि श्रीदुर्गासप्तशती के नाम से विश्व प्रसिद्ध है, जिसके तृतीय अध्याय के श्लोक सं. 28 में सर्वप्रथम चण्डी शब्द का उल्लेख जगदम्मा द्वारा महिषासुर पर महान क्रोध करने के कारण हुआ है अर्थात जगजननी, जगदम्बा का क्रूर अवतार रूप (Ferocious Incarnation),  माँ चण्डी के नाम से जाना जाता है।

माँ चण्डी देवी मन्दिर के सेवायत/महन्त श्री रोहित गिरी जी का पारिवारिक इतिहास

जगत गुरू आदि शंकराचार्य जी द्वारा माँ चण्डी देवी मन्दिर का आठवी सदी में जब जीर्णोद्बार / पुर्णस्थापित कर मन्दिर की पूजा-पाठ वो व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी तत्कालीन समय के इस स्थल के सेवायत / पुजारी सिद्धेश्वर परम पूज्य महागुरू पुरूषोत्तम जी महाराज को पुर्व की भाँति एकमात्र रूप से सैंप दी गई थी, उक्त सिद्धेश्वर परम पूज्य महागुरू पुरूषोत्तम जी महाराज इस पवित्र स्थल पर जगत गुरू आदि शंकराचार्ज जी महाराज के आगमन के पुर्व से ही माँ चण्डी देवी की पुजा-पाठ एवं साधना करते थे, जिनके प्रमुख रूप से दौ शिष्य थे जिनमें से एक स्व. भवानी पुरी जी के पूर्वज गुरू व एक स्व. रूद्रनन्दन गिरी जी के पूर्वज गुरू थे। उक्त स्व. भवानी पुरी जी एवं स्व. रूद्रनन्दन गिरी, मन्दिर के वर्तमान महन्त श्री रोहित गिरी जी के पूर्वज गुरू है। मन्दिर के वर्तमान महन्त श्री रोहित गिरी जी को गुरू-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्राप्त सेवायती अधिकार एवं जानकारी के अनुसार, माँ चण्डी देवी मन्दिर की समस्त देवोत्तर सम्पत्ति का प्रवंन्धन व संचालन 19 शताब्दी के प्रारम्भ से अर्थात लगभग वर्ष 1800 से निम्न प्रकार रहा है :-

        स्व. भवानीपुरी स्व.                                                रूद्रनन्दन गिरी

         (संयुक्त सेवायत)                                                (संयुक्त सेवायत)

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          स्व. मोहन पुरी                                             स्व. रामवल्लभ उर्फ .... गिरी

         (संयुक्त सेवायत)                                                (संयुक्त सेवायत)

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          स्व. हरनाम पुरी                                                 स्व. शंकर गिरी

         (संयुक्त सेवायत)                                                (संयुक्त सेवायत)

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